Wednesday, 9 July 2014

वाणी-वन्दना


रचती रही नूतन भाव सदा, कवियों के उरों में समाती रही।
कवि मैथिल के मिस भक्ति कभी, रस राज का रास सुनाती रही।।
कवि चंद के छंद विधान लिये, रणक्षेत्र में जा मंडराती रही।
कबिरा के कपाल में बैठि कभी, सद्ग्यान का पंथ दिखाती रही।।

जगमंगल भाव लिये तुलसी, कविता सुधाधार बहाते रहे।
शिशु की शिशुता का सनेह सना, रस सूर सदा सरसाते रहे।।
रसखान लिये रसराज छटा, रति भाव-प्रसून लुटाते रहे।
तव आशिष पा कवि भूषण भी, जन जागृति-ओज जगाते रहे।।

करुणामयी हे करुणा करके, इस ओर भी नैकु निहार दे माँ।
युग के अनुरूप दिया सभी को, इसको कुछ नूतन सार दे माँ।।
जग देखता ही रह जाय खड़ा, कुछ दुर्लभ सा मृदु प्यार दे माँ।
जिससे जग को कुछ दे सके ये, प्रतिभा कुछ ऐसी निखार दे माँ।।

भटके हुये मानव को पथ से, पथ इष्ट पे खींच के ला सकूँ मैं।
बुझती हुई नैतिकता की शिखा, कुछ ग्यान कणों से जगा सकूँ मैं।।
मनु का रहे स्वत्व घनत्व लिये, मनुजत्व का तत्व सिखा सकूँ मैं।
वरदायिनी हो यदि तेरी कृपा, कवि कर्म का मर्म निभा सकूँ मैं।।

Monday, 6 January 2014

सरस्वती -वन्दना

                सरस्वती - वन्दना
                ______________
            नव सृजन की शक्ति दे मां।
जन भटकता जा रहा है ,
            भ्रान्ति, मृगतृष्णा बनी है।
छा रहा अविवेक का तम,
             दम्भ की छाया घनी है।
सहज सात्विकता सराहें,
              वह अटल अनुरक्ति दे मां।
               नव सृजन की शक्ति दे मां।
स्वार्थपरता,दनुजता का,
                नग्न नर्तन सीखता जग।
बढ़ रहा अज्ञान पथ पर,
                 मनुजता के शीश धर पग।
आत्मसंयम, सत्य निष्ठा,
                  की अलौकिक भक्ति दे मां।
                   नव सृजन की शक्ति दे मां।
ज्ञान के स्नेहिल स्वरों से,
                   हम जगा दें विश्व भर को।
तज अधोगति, वरण कर ले,
                    मनुज अपने मनुजपन को।
वह सुधा-रस से समन्वित,
                    ग्यानमय सद्उक्ति दे मां।
                     नव सृजन की शक्ति दे मां।
दीन, हीन,निरीह कोई,
                      दुख न पावे सबल कर से।
श्रम समर्पित हों सभी, सद् -
                       भावना का मेघ बरसे।
इन दृगों से,यह सभी कुछ,
                        देखने की तृप्ति दे मां।
                         नव सृजन की शक्ति दे मां।
                       _____________


Saturday, 4 January 2014

कवि की कामना

                           कामना
                          _______
                                   स्वर्णिम दीप जले।
प्रगति पंथ पर झलके आभा, नूतन प्राण पले।।
                                   स्वर्णिम दीप जले।।
हठ -छल -दम्भ -द्वेष की माया, जग से दूर भगे।
नवल - ह्र्दय -उत्साह -अनालस, में मन प्राण पगे।
सत्य -प्रेम -करुणा का सुर तरु,उर-उर बीच फले।।
                                      स्वर्णिम दीप जले।।
पर ईर्ष्या पर द्रोह दमित हो,जीवन लक्ष्य मिले।
उपजे,शुचि सद्भाव परस्पर, ह्र्दय सरोज खिले।
मानव -मानव का मन तन जब, जीवन साथ चले।।
                                     स्वर्णिम दीप जले।।
देश -जाति- बन्धन तज मानव, जग की ओर बढ़े।
विश्व -शान्ति मानवता -हित नित,नव सोपान चढ़े।
युद्ध -क्लान्ति दिग्भ्रान्ति, दनुजता, का अभिशाप ढले।।
                                         स्वर्णिम दीप जले।।
दु:ख, दैन्य, लघुता का क्रन्दन, श्रुति -पथ में न अड़े।
जन-जीवन पर समता ममता, का मधुमेह झड़े।
निरुज, निरभिमद मनु - संतति हो,जड़ अवसाद टले।।
                                         स्वर्णिम दीप जले।।
                  दया का स्वर्णिम दीप जले।।
                             ________

Friday, 3 January 2014

मइया की पुकार

              लोकगीत - ( मइया की पुकार)
       भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि!
लेइ बलैया लाल हमारे, आवहु द्वार सवांरे,
उरझी नाव देश कै, फिरिकै लावहु खींचि किनारे,
       लखिकै पूतन कै करतूतै रोवै आंसू  ढारि ढारि।
        भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि।
तुम्हरे रकतन सिंचो बगीचो, तोरहिं अउरु उजारैं,
खुदगरजी कै अगिनि लगाइनि, हँसि हँसि हाय पजारैं,
         आपन घर मां आगि लगावँइ आपै ढारैं वारि।
        भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि।
सिंदूरन कै लाज बचौते, भुख मरुअन कै रोटी ,
दलितन लाइ गरे मां लेते, नंगन देत लँगोटी,
         सो छीना झपटी पर उतरे हमरी कोखि बिसारि।
          भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि।
दूध लजाइनि हमरो सिगरो, राजघाट कौ तारिनि,
भोरी जनता का बहकाइनि, बहुरुपिया पन धारिनि,
         सारी दुनिया ते उठाइनि हो दियानत हमारि।
         भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि।
मैना होती झलकारिन या होती लक्ष्मी रानी,
वीर शिवा, सुखदेव सरीखे, जो होते बलिदानी,
    काहेक नया डगमग डोलति काहेक कुगति हमारि।
         भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि ।
होउ जहां अम्बर तै फाटउ, यह विपदा निरवारौ,
सिंची खून की बाग न उजरै, यहिका दौरि बचावौ,
         अबहूं समय देश कै धरती, आवहु लेहु उबारि।
          भारत मइया हो पुकारै तुम्हैं अँचरा पसारि।
                               ______

Wednesday, 1 January 2014

लोकगीत - उतारैं आरती

                     लोक गीत -उतारैं आरती
     (आकाशवाणी,लखनऊ द्वारा प्रसारित देशगीत)

       आवउ देश के शहिदवौ उतारै आरती।
कबको मुरझो देखि न पायेउ अपनो देश बगीचो,
तन कै रकत विहँसि हँसि अंजुरिन भरिके जेहि का सींचो,
       आजु पूजा कै सजाये साजु ठाढ़ी भारती।
       आवउ देश के शहिदवौ उतारैं आरती।
वनिता, सुत को मोह न कीन्हेउ झूलेउ मौत हिंडोले,
बरछी,ढाल,कृपाण सहेउ सब सहेउ बम्ब के गोले,
       माता तुमका निहारै आंसू धार ढारती।
       आवउ देश के शहिदवौ उतारैं आरती।
धरती के कन -कन मां रमिगइ तुम्हरी अमर कहानी,
मरिकइ मइया केर  बचायेउ तुम आंखिन कै पानी,
       वहइ अंचरा पसारे मइया प्रान वारती
       आवउ देश कै शहिदवौ उतारैं आरती। 

Sunday, 29 December 2013

लोकगीत - साजउ माता कै बहुरिया (स्वतंत्रता गीत)

   लोकगीत

(यह लोकगीत स्वतंत्रता को समर्पित है तथा आकाशवाणी लखनऊ द्वारा प्रसारित किया जा चुका है)

           साजउ माता कै बहुरिया सिंगारु अपना।
ब्रम्हपुत्र गंगा कौ निरखौ, जमुना कृष्ण कवेरी,
सती नर्मदा सरजू परखौ, गण्डक सोन निवेरी,
निरखौ मलकिन होइकै घर को पसारु अपना।।
           साजउ माता कै बहुरिया सिंगारु अपना।
अनगिन लाल लुटे लइबे मां,तुमरे टाट पटोरे,
अनगिन पूत मांग भरिबे कौ, तन को रकतु निचोरे,
निरखौ अचल सुहाग कौ, पगारु अपना।।
           साजउ माता कै बहुरिया सिंगारु अपना।
कोई परोसी तुमहि कनखियन, देखइ नैकु न भूलउ,
वीर शिवा सुखदेव निहारउ, तुम उन हिन पर फूलउ,
तजि कै प्रीति परदेसी कै विचारु अपना।।
          साजउ माता कै बहुरिया सिंगारु अपना।
दिल्ली और हिमाचल निरखौ, महाराष्ट्र केराला,
राजस्थान बंग कौ परखौ, एक - एक ते आला,
धानी चूनर संवारउ रूप सारू अपना।।
          साजउ माता कै बहुरिया सिंगारु अपना।

Sunday, 22 December 2013

जीवन परिचय

                    जीवन परिचय
                    राम शंकर त्रिवेदी

         22 जुलाई सन् 1933 ईसवी को खीरी जनपद के ग्राम भीखमपुर में इनका जन्म हुआ। इनके पिता का नाम श्री केदारनाथ त्रिवेदी था। वे एक सामान्य परिवार के व्यक्ति थे, किन्तु सादगी और सरलता उनके जीवन के अंग थे। राम शंकर त्रिवेदी ने प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद शेष सम्पूर्ण शिक्षा स्वाध्याय द्वारा प्राप्त की। इन्होंने हिंदी तथा संस्कृत विषय में परास्नातक किया। प्रारम्भिक शिक्षा के उपरान्त ये अध्यापन कार्य में लग गये। प्राथमिक विद्यालय से लेकर इन्टरमीडिएट कालेज तक अध्यापन कार्य किया। युवराज दत्त इन्टर कालेज ओयल खीरी में संस्कृत प्रवक्ता पद पर रहकर एक सफल अध्यापक का जीवन व्यतीत किया।इनकी लोकप्रियता एवं शत प्रतिशत परीक्षाफल को देखते हुए इन्हें राज्य सरकार द्वारा "दक्षता - पुरस्कार " से सम्मानित किया गया। सन् 1963-64 में एक वर्ष के लिए राजकीय इन्टर कालेज अमरोहा उ. प्र. में अध्यापन कार्य किया। प्रबन्ध समिति युवराज दत्त इन्टर कालेज ओयल द्वारा इनकी योग्यता एवं व्यवहार को देखते हुए इन्हें उसी पद पर पुनः वापस बुला लिया गया और फिर सेवानिवृति तक यहीं रहे। बचपन से ही इनकी काव्य प्रतिभा झलकने लगी थी। उसमें दिन प्रतिदिन निखार आता गया। और उस क्षेत्र  में " कवि जी "उपनाम से प्रसिद्ध हुए। यहां के जनमानस में इनकी पहचान एक कवि, विद्वान,एवं सरल व्यक्तित्व वाले सफल शिक्षक के रूप में है।सन् 1994 में सेवानिवृत होकर ये वर्तमान समय में टीचर्स कालोनी ओयल में ही रहकर काव्य साधना कर रहे हैं। इन्होंने लगभग 500 फुटकर कविताओं के अतिरिक्त कई खण्ड काव्य लिखे हैं। इनकी प्रकाशित रचनाएँ निम्न हैं _
    1- वीराग्रणी राणा।
    2-प्रयास।
    3-लघु गीत संग्रह।
    4-नववर्ष। (उपन्यास)
    5-स्मृति।
    6-भर्तृहरि शतक का पद्यानुवाद।
    7-अमर शहीद। (खण्ड - काव्य)
इसके अतिरिक्त अन्य रचनायें जो सम सामयिक विषयों पर लिखी गई हैं, अप्रकाशित हैं।
खडी बोली के अतिरिक्त इनके अवधी एवं बृजभाषा के गीत विशेष रूप से लोकप्रिय रहे हैं। इनके लिखे दो गीत आकाश वाणी लखनऊ द्वारा प्रसारित किये गये थे जिनकी विशेष सराहना की गयी थी। ( ये दोनों गीत आगे दिये जायेंगे)। लखनऊ विश्व विद्यालय में शोध छात्रों के द्वारा इन पर दो " लघु शोध प्रबन्ध " भी लिखे गये हैं। समय - समय पर इनको कई प्रतिष्ठित सामाजिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जाता रहा है।

        यहां पर इनके व्यक्तित्व की कुछ असाधारण विशेषताओं  का वर्णन करना समीचीन प्रतीत होता है -
        1- इनकी अद्भुत स्मरण-शक्ति।
        2-इनकी अद्भुत श्रवण -शक्ति।
        3-शस्त्र - संचालन की कुशलता एवं अचूक -
             निशाना।
        4-अद्भुत सकारात्मकता एवं साहस।
        5-अद्वितीय वक्ता।
पारिवारिक स्थिति  - इनके परिवार में पत्नी, चार पुत्रियां एवं एक पुत्र है। ये सभी विवाहित हैं तथा प्राथमिक से लेकर उच्च - शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं। इसके अतिरिक्त इनके दो पौत्र, चार नवासे एवं चार नवासिया हैं। इनके स्नेह एवं आशीर्वाद से सिंचित इस परिवार में इनके संस्कार व अनुशासन की विरासत परिलक्षित होती है।  ---            डा. नीलम त्रिवेदी  ( पुत्री) 

Thursday, 5 December 2013

गीत - आज जलधर क्यों गरजते

गीत

                    आज जलधर क्यों गरजते। 
वह मधुर मुस्कान जिसको देखकर चिढ़ते कभी थे,
हास को परिहास दामिनि,जानकर कुढते कभी थे।
आज तो हम हैं अकेले, फिर कहो किससे अकड़ते,
                    आज जलधर क्यों गरजते।। 
हम जगत से दीन होकर, एक थे आशा लगाये,
तुम दृगों में आ बसोगे, विरह की धूनी रमाये।
तुम न आये, जान एकाकी, अरे जलधर गरजते, 
                    आज जलधर क्यों गरजते।। 
जा अरे घन दूर जा रे,जा कहे संदेश मेरा, 
हाय तुम छाये कहां, छाया यहां गुरुतर अँधेरा।
किसी प्रलोभन मे गये, हा छोड़कर मुझको तड़पते, 
                    आज जलधर क्यों गरजते।। 
आह उठती है हृदय में, औ नयन में अश्रुधारा, 
विकलता रह-रह उमड़ती, विश्व लगता हाय कारा।
हाय अरमानों की दुनिया,थी बसी देखा उजड़ते, 
                    आज जलधर क्यों गरजते।।

Friday, 29 November 2013

गीत - कवि से...

गीत 



है प्रगति का पंथ पाना।

विहँसते उपवन मिलेंगे,खिलखिलाती सुमनमाला,
और लतिका मुस्कराती, गान मधुपों का निराला।
ओस के मोती बिछे से, देखकर मत मन लुभाना,
है प्रगति का पंथ पाना। 

विरह से जलता पपीहा, कह उठेगा देख तुझको, 
पी कहां रे पी कहां हा, खोज रे मम प्राण पियको।
उस समय विरही न बनकर, अश्रु  छन्दों में बहाना, 
है प्रगति का पंथ पाना। 

देखता आया युगों से,विश्व परिवर्तक विधाता, 
हो तुम्हीं जन-जन ह्रदय के,भय विदारक सौख्यदाता।
कल्पना के लोक से है,साधना के लोक आना,
है प्रगति का पंथ पाना।

आज जन-जन के ह्रदय से,दूर कर दे रे दुराशा,
एकता का भाव भर दे,कर फुरित उत्फुल्ल आशा।
नव प्रगति का गीत गा रे, तज प्रणय के गीत गाना,
है प्रगति का पंथ पाना। 

Sunday, 24 November 2013

गीत - आज कहां हो

गीत


                           सूने तम में आज कहां हो ।।
भाव अकिंचन ह्रदय शून्य हैं,प्रेमल विहर रहे किस थल में,
खोज -खोज कर हार चुका हूँ,तुम बसते हो अन्तर तल में,
विजन शरद निशि घूर रही है, ऐसे में चितनाथ कहां हो।                             सूने तम में आज कहां हो।।

कभी कहा था याद रहेंगे, जीवन में ये जीवन के दिन,
बसे रहेंगे सदा दृगों में, कभी न होंगे विलग एक क्षण,
भूल गया या भूल गये हो,जीवन के ॠतुराज कहां हो।
                          सूने तम में आज कहां हो।।

संसृति घोर द्वंद्व करती है,परिवर्तित होकर क्षण -क्षण में,
भय लगता है, भूल न जाना, पड़कर के इस प्रेमल पथ में,
आज जगत को भूल चुका हूँ, स्मृति के आधार कहां हो।
                          सूने तम में आज कहां हो।।

जीवन सागर की लहरों में,खोज -खोज कर मन मारा,
तट पर हो या सलिल बीच हो,कब से अब तक पंथ निहारा,
लोचन मग से उर में आओ, जीवन के घनश्याम कहां हो।
                         सूने तम में आज कहां हो।।

मलय समीरण की सर-सर में, आज प्रणय के गीत कहां,
अंधकार में हाय, अकेला, जीवन चित्र अतीत कहां,
जला रही है विरह अनल, बन जीवन वन वनराज कहां हो।
                        सूने तम में आज कहां हो।। 

Saturday, 23 November 2013

गीत - रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो...

गीत 


रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो। 

कोई छलिया न पथ में तुम्हें जाय मिल, 
देख उसकी अदा उर- कमल जाय खिल। 
प्रेम का एक नाटक न दे वह रचा, 
और तुम पात्र बनकर लुटा दो अखिल। 
वह सफलता पे अपनी स्वयं हो फिदा, 
और तुम गर्व से मुस्कराती चलो। 

रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो ।। 

तेरे सौन्दर्य की कर प्रशंसा यहां, 
लूट लेने को कितने भ्रमर घूमते। 
प्रेम का ढोंग, वैभव की ढपली बजा, 
वासना से विनत हो चरण चूमते। 
अपनी लय-ताल पर दें न तुमको नचा,
और तुम भाग्य पर गुनगुनाती चलो। 

रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।। 

है अमरता न यौवन की इस राह पर,
नाम भ्रमरों के जो साथ जुड़ जायगा। 
जिन्दगी भर न छूटेगा यह दाग फिर, 
तेरे जीवन का उपवन उजड़ जायगा। 
पास होंगे न वे,साथ होगा न जग,
तब बचेगा, झिझकती लजाती चलो।

रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।। 

कोई चातक न तुमको कभी चाव से,
मान घनश्याम अपलक निहारा करे।
प्यार में हो समर्पित तुम्हारे लिये, 
अपना तन- मान- धन नित्य वारा करे। 
तब समय याद आयेगा बीता हुआ, 
पंथ होगा कि आंसू बहाती चलो। 

रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।।  

Wednesday, 20 November 2013

गीत - कवि क्या कर दे?

                            गीत

बोलो तो कवि क्या कर दे ।।
एक ओर दलितों की आहें,रह-रह हाय निकलतीं।
एक ओर भूखे शिशुओं की,भूखी सांसें ढलती   ।
माता निरख रही शिशुओं को,भीगी पलकों से   ।
स्नेह प्रदर्शित करती उनकी, रूखी अलकों से  ।
बोलो उनके जीवन गहवर, में कवि क्या भर दे  ।
नीरस जीवन-घट को कैसे, सरस मधुर कर दे  
बोलो तो कवि क्या कर दे ।।

एक ओर झनकार रहीं, तलवारें सीमा पर।
दस्यु गरजते इधर आ रहे, बढ़ते ही सर पर।
प्रक्षेपास्त्र ग्रसित नभ मण्डल, थर थर कांप रहा।
समय निरन्तर मानवता की सीमा  नाप  रहा।
बोलो उनके प्राणों में कवि,विजय घोष भर दे।
अथवा शाश्वतशान्ति,युक्त जन स्वासों को कर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।

एक ओर बहती हैं फैशन की रंगीन हवाएँ।
प्रेमालाप किये देता है,मुखरित मौन दिशाएँ।
अरे आज सौन्दर्य निरा उपहास बना जाता।
उच्छृंखलता का भारत को रोग लगा जाता।
उन्हे सात्विक प्रेम पंथ का,सहज ग्यान वर दे।
अथवा झूठे विरह समाकुल, उर में रस भर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।

Monday, 18 November 2013

गीत - हम न होंगे एक दिन संसार होगा

गीत 

हम न होंगे एक दिन संसार होगा। 
अश्रु पलकों  में छुपाये, 
याद कर पिछली कहानी। 
हूक अन्तर में उठेगी, 
देख कर कोई निशानी। 
उर भरे अवसाद में, मेरा सिसकता प्यार होगा। हम 0
तरु लताएँ झूमकर, जब,
मोद उर-उर में भरेंगी। 
मंद मलयानिल लहक कर, 
जब हृदय शीतल करेगी।
पी कहाँ, स्वर के सुनें, उर-बीच हाहाकार होगा। हम 0
जब कहीं कोई करेगा, 
भूलकर गुणगान मेरा।
या कभी तुमको दिखेगा, 
था जहाँ मेरा बसेरा। 
हूक जब उर में उठेगी, शेष क्या उपचार होगा। हम 0
सबल संबल बन जिन्हें, 
देते रहे अविरल सहारा। 
आज यद्यपि मिल चुका है,
विपद सरिता का किनारा। 
याद आयेगी उन्हें, जब, सामने मँझधार होगा। हम 0
अज्ञता वश आज जिनको,
मूल्य लगता शून्य मेरा। 
समय आते सब उन्हें, 
समझा चुकेगा जग चितेरा। 
सिर धुनेंगेे कर मलेंगे, मात्र यह प्रतिकार होगा। हम 0

Saturday, 16 November 2013

गीत -तुम नहीं हो

                               गीत 

                                    आज हम हैं तुम नहीं हो। 
                   यह मलय चंचल समीरण, 
                   डालियों से खेलता सा,
                   झूमता है कुंज दल में,
                   सहज सौख्य उड़ेलता सा, 
     सब सुमन तो हँस रहे हैं, पर अकेले तुम नहीं हो। 
                                    आज हम हैं तुम नहीं हो। 
                   मधुप अवली पान कर,
                   मकरंद को इठला रही है, 
                   झूंक से तरु वल्लरी भी, 
                   झूमती हैं गा रही हैं, 
    चांदनी है, चंद्र भी है, पर अकेले तुम नहीं हो।
                                  आज हम हैं तुम नहीं हो। 
                   कोकिलों की तान मोहक,
                   उपवनों में छा रही है, 
                   कुछ घुमड़ घिर घन घटा भी, 
                   शून्य पथ पर आ रही है, 
   विज्जु है, हँसती हुई भी, पर अकेले तुम नहीं हो। 
                                  आज हम हैं तुम नहीं हो। 
                   आ गया ॠतुराज सुंदर, 
                   नव सुखद संसार लेकर, 
                   हम एवं विरही पपीहा, 
                   रो रहे हा आश खोकर, 
   पूर्व जग है, हँस रहा भी, पर अकेले तुम नहीं हो। 
                                 आज हम हैं तुम नहीं हो। 

Friday, 15 November 2013

गीत -कुंजों में आओ

                                 गीत 

                                      सूने दृग कुंजों में आओ।
      जिन कुंजों में बसे रहे थे, उनको मत विसराओ। 
      बाल सुलभ चापल्य दिखाकर, लुकते छिपते आओ।
      मोद भरो आकर के उर में, सूने कुंज बसाओ। 
      आज अश्रुधारा से तेरे, कुंज बहे जाते हैं। 
      जीवन अरमानों के मंदिर, हाय ढहे जाते हैं। 
      यदि कुंजों को सूना करके, छोड़ तुम्हें जाना था। 
      तो इन कुंजों को पहले से, कभी न अपनाना था। 
      आओ-आओ फिर कुंजों में, आकर इन्हें बसाओ। 
      चंद बदन की मंजु चंद्रिका, आ इनमें बिखराओ। 
                                        सूने दृग कुंजों में आओ।





Wednesday, 13 November 2013

गीत - पंछी केवल नीड़ न झांको

गीत 

पंछी केवल नीड़ न झांको,
                         बाहर सोने का संसार।

कुछ तिनकों को बीन-बीन कर,
                         तुमने अपना नीड़ बनाया। 
स्वर्ण क्षणों का संगम देकर,
                         उन तिनकों में स्नेह सजाया। 
वे हैं जिस संसृति के तिनके,
                         वह संसृति है रूप अगार। 
                         पंछी केवल नीड़ न......।।

ममता पली नीड़ में रहकर,
                         स्वप्न सुनहरे कितने आये। 
जिनमें जीवन भी मुसकाया,
                         पर अभिमत फल हाथ न आये। 
कोई अभिमत फल दाता भी,
                         इस जग के उस पार। 
                         पंछी केवल नीड़ न....।।

ये तरु-लता देखकर तुझको,
                         एक क्षितिज रेखा भर देते। 
क्षितिज अंक ले विश्व तुम्हारा,
                         उसमें प्राणों के स्वर देते। 
संसृति के प्राणों का सरगम,
                         व्याप्त जहां वह शून्य अपार। 
                        
पंछी केवल नीड़ न झांको,
                         बाहर सोने का संसार।

Tuesday, 12 November 2013

गीत -जब हँस पड़े थे

गीत 

 नत नयन जब हँस पड़े थे।
                    मंद मलयानिल लहकती, 
                    तरु लताएँ झूमती थीं,
                    उपवनों में पुष्प दल के, 
                    वल्लरी मुख चूमती थी।
देखकर हम खिल उठे थे,
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
                    फिर कभी देखा गगन में, 
                    मेघ घिरते आ रहे हैं, 
                    अंशुमाली झेंपते से, 
                    ताप खोकर जा रहे हैं।
देख हम विस्मित हुए थे,
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
                    गात जग के कांपते थे, 
                    जब भयंकर शीत से, 
                    हम मिले थे कांपते से, 
                    जब परस्पर प्रीति से।
दृग दृगों से कह उठे थे,
कुछ नत नयन जब हँस पड़े थे।।
    नत नयन जब हँस पड़े थे।। 
       
                    
                

               

Sunday, 10 November 2013

गीत - प्यार में हम तुम्हारे तड़पते रहे

                               गीत 

प्यार में हम तुम्हारे तड़पते रहे,
              तुम कहीं और नजरें मिलाती रहीं।

रूप सौन्दर्य की वन्दना में सदा,
               पा दिलासा तेरा,सर झुकाते रहे।
तुम न रूठो कभी नित नये चाव से,
                हो मुखर प्यार के गीत गाते रहे।
स्वर हमारे सुने अनसुने कर दिये,
                तुम किसी का प्रणय गीत गाती रहीं।

                प्यार में हम तुम्हारे तड़पते रहे।

हर समय हम तुम्हारे दिवाने बने,
                 प्यार में रात दिन आह भरते रहे।
फूल से तन पे कोई भ्रमर लालची,
                 दृष्टि दे ना गड़ा, ध्यान धरते रहे।
किन्तु उर में हमारे न झांकी कभी,
                 दृग किसी और के मग विछातीं रहीं।

                 प्यार में हम तुम्हारे तड़पते रहे।

बन कसक प्यार की हूक उठती रही,
                      उर सदा प्यार को ही मचलता रहा।
बेवफाई बनी तीर गड़ती रही,
                      प्यार तेरे विरह बीच जलता रहा।
वह सिसकता हुआ तोड़ता-दम रहा -
                      तुम नशेमन किसी का सजातीं रहीं।

                      प्यार में हम तुम्हारे तड़पते रहे।

Saturday, 9 November 2013

गीत -छोड़कर मुझको अकेला

                                गीत 

छोड़कर मुझको अकेला, 
                             जा रहे किस ओर राही।
             प्रेम तरु की सघन छाया-
             पा, किया आवास अपना। 
             विश्व झंझा से बचे तुम,
             सच हुआ कुछ मधुर सपना। 
             किन्तु तुमने क्या किया यह
                             बन चले चित चोर राही।
             नत नयन हँसते हुए ही, 
             चित्त में गहरे समाये।
             मधुर सी मुस्कान का रस,
             विहँस कर नित साथ लाये।
जब चले आहत किया क्यों? 
                             उर नयन की कोर राही।। 
             कट रही जीवन निशा अब, 
             आ रही अवसान, वेला।
             स्नेह तरु पल्लव झड़े सब,
              रह गया पतझड़ अकेला। 
अब तुम्हारे स्वर्ण दिन का, 
                             हो रहा है भोर राही।। 
              पल्लवों ने जो किया कुछ, 
              और सुमनों ने सजाया।
              कंटकों ने विषधरों से,
              विश्व के तुमको बचाया।।
तव पलायन पर घृणा से, 
                             जग करेगा शोर राही।।