गीत
नत नयन जब हँस पड़े थे।
मंद मलयानिल लहकती,
तरु लताएँ झूमती थीं,
उपवनों में पुष्प दल के,
वल्लरी मुख चूमती थी।
देखकर हम खिल उठे थे,
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
फिर कभी देखा गगन में,
मेघ घिरते आ रहे हैं,
अंशुमाली झेंपते से,
ताप खोकर जा रहे हैं।
देख हम विस्मित हुए थे,
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
गात जग के कांपते थे,
जब भयंकर शीत से,
हम मिले थे कांपते से,
जब परस्पर प्रीति से।
दृग दृगों से कह उठे थे,
कुछ नत नयन जब हँस पड़े थे।।
कुछ नत नयन जब हँस पड़े थे।।
नत नयन जब हँस पड़े थे।।
देखकर हम खिल उठे थे, नत नयन जब हँस पड़े थे।।
ReplyDeleteसुन्दर गीत।
निराला की सरोज स्मृति की पंक्तियां याद आ गयीं:
नत नयनों से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।