गीत
सूने तम में आज कहां हो ।।
भाव अकिंचन ह्रदय शून्य हैं,प्रेमल विहर रहे किस थल में,
खोज -खोज कर हार चुका हूँ,तुम बसते हो अन्तर तल में,
विजन शरद निशि घूर रही है, ऐसे में चितनाथ कहां हो। सूने तम में आज कहां हो।।
कभी कहा था याद रहेंगे, जीवन में ये जीवन के दिन,
बसे रहेंगे सदा दृगों में, कभी न होंगे विलग एक क्षण,
भूल गया या भूल गये हो,जीवन के ॠतुराज कहां हो।
सूने तम में आज कहां हो।।
संसृति घोर द्वंद्व करती है,परिवर्तित होकर क्षण -क्षण में,
भय लगता है, भूल न जाना, पड़कर के इस प्रेमल पथ में,
आज जगत को भूल चुका हूँ, स्मृति के आधार कहां हो।
सूने तम में आज कहां हो।।
जीवन सागर की लहरों में,खोज -खोज कर मन मारा,
तट पर हो या सलिल बीच हो,कब से अब तक पंथ निहारा,
लोचन मग से उर में आओ, जीवन के घनश्याम कहां हो।
सूने तम में आज कहां हो।।
मलय समीरण की सर-सर में, आज प्रणय के गीत कहां,
अंधकार में हाय, अकेला, जीवन चित्र अतीत कहां,
जला रही है विरह अनल, बन जीवन वन वनराज कहां हो।
सूने तम में आज कहां हो।।
सूने तम में आज कहां हो!
ReplyDeleteसुन्दर गीत!