Friday, 1 November 2013

गीत-हम भाग जायें

                              गीत

तुड़ाकर के ये प्रेम बंधन तुम्हारा, 
                      कई बार सोंचा, कि हम भाग जायें।
मगर ठौर से पैर हटते नहीं हैं,
जमे नैन मुख से टसकते नहीं हैं। 
हृदय में भरे भाव टलते नहीं हैं,
किसी और को तो मचलते नहीं हैं।
सुधा रूप  मद से, स्वयं को बचा के,
                      कई बार चाहा कि हम भाग जायें।।
                      कई बार सोचा कि हम भाग जायें।। 
       कभी याद आते हैं, दो नैन प्यारे,
       विवश कर हृदय बीच धँसते हमारे। 
       उचक नासिका-पुट थपेड़े करारे,
       हुमक कर नई चोट उर बीच मारे। 
                       सचल बंक भृकुटी के मनुहार से  बच-
                        कई बार सोंचा कि हम भाग जायें। 
न हम भाग पाये,न तुम जा सके हो, 
अनिच्छा सही,किन्तु, अब तक रुके हो। 
तने तुम रहे पर,कभी तो झुके हो, 
कहो प्राण क्या उस झुकन में लुके हो। 
कहीं लौट आयें मेरे प्राण मुझ तक-
                       उन्हें साथ ले हम अभी भाग जायें। 
                       कई बार सोचा कि हम भाग जायें।
     

2 comments :

  1. बहुत प्यारी गीत।

    ये वाला गीत तो घर-घर की कहानी है। इसको तो कविजी की आवाज में आना ही चाहिये।

    खासकर ये पंक्तियां बहुत अच्छी लगीं:

    न हम भाग पाये,न तुम जा सके हो,
    अनिच्छा सही,किन्तु, अब तक रुके हो।
    तने तुम रहे पर,कभी तो झुके हो,
    कहो प्राण क्या उस झुकन में लुके हो।
    कहीं लौट आयें मेरे प्राण मुझ तक-
    उन्हें साथ ले हम अभी भाग जायें।
    कई बार सोचा कि हम भाग जायें।

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ramshankartrivedi@gmail.com