Friday, 29 November 2013

गीत - कवि से...

गीत 



है प्रगति का पंथ पाना।

विहँसते उपवन मिलेंगे,खिलखिलाती सुमनमाला,
और लतिका मुस्कराती, गान मधुपों का निराला।
ओस के मोती बिछे से, देखकर मत मन लुभाना,
है प्रगति का पंथ पाना। 

विरह से जलता पपीहा, कह उठेगा देख तुझको, 
पी कहां रे पी कहां हा, खोज रे मम प्राण पियको।
उस समय विरही न बनकर, अश्रु  छन्दों में बहाना, 
है प्रगति का पंथ पाना। 

देखता आया युगों से,विश्व परिवर्तक विधाता, 
हो तुम्हीं जन-जन ह्रदय के,भय विदारक सौख्यदाता।
कल्पना के लोक से है,साधना के लोक आना,
है प्रगति का पंथ पाना।

आज जन-जन के ह्रदय से,दूर कर दे रे दुराशा,
एकता का भाव भर दे,कर फुरित उत्फुल्ल आशा।
नव प्रगति का गीत गा रे, तज प्रणय के गीत गाना,
है प्रगति का पंथ पाना। 

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