गीत
बोलो तो कवि क्या कर दे ।।
एक ओर दलितों की आहें,रह-रह हाय निकलतीं।
एक ओर भूखे शिशुओं की,भूखी सांसें ढलती ।
माता निरख रही शिशुओं को,भीगी पलकों से ।
स्नेह प्रदर्शित करती उनकी, रूखी अलकों से ।
बोलो उनके जीवन गहवर, में कवि क्या भर दे ।
नीरस जीवन-घट को कैसे, सरस मधुर कर दे
बोलो तो कवि क्या कर दे ।।
एक ओर झनकार रहीं, तलवारें सीमा पर।
दस्यु गरजते इधर आ रहे, बढ़ते ही सर पर।
प्रक्षेपास्त्र ग्रसित नभ मण्डल, थर थर कांप रहा।
समय निरन्तर मानवता की सीमा नाप रहा।
बोलो उनके प्राणों में कवि,विजय घोष भर दे।
अथवा शाश्वतशान्ति,युक्त जन स्वासों को कर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।
एक ओर बहती हैं फैशन की रंगीन हवाएँ।
प्रेमालाप किये देता है,मुखरित मौन दिशाएँ।
अरे आज सौन्दर्य निरा उपहास बना जाता।
उच्छृंखलता का भारत को रोग लगा जाता।
उन्हे सात्विक प्रेम पंथ का,सहज ग्यान वर दे।
अथवा झूठे विरह समाकुल, उर में रस भर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।
बोलो तो कवि क्या कर दे ।।
एक ओर दलितों की आहें,रह-रह हाय निकलतीं।
एक ओर भूखे शिशुओं की,भूखी सांसें ढलती ।
माता निरख रही शिशुओं को,भीगी पलकों से ।
स्नेह प्रदर्शित करती उनकी, रूखी अलकों से ।
बोलो उनके जीवन गहवर, में कवि क्या भर दे ।
नीरस जीवन-घट को कैसे, सरस मधुर कर दे
बोलो तो कवि क्या कर दे ।।
एक ओर झनकार रहीं, तलवारें सीमा पर।
दस्यु गरजते इधर आ रहे, बढ़ते ही सर पर।
प्रक्षेपास्त्र ग्रसित नभ मण्डल, थर थर कांप रहा।
समय निरन्तर मानवता की सीमा नाप रहा।
बोलो उनके प्राणों में कवि,विजय घोष भर दे।
अथवा शाश्वतशान्ति,युक्त जन स्वासों को कर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।
एक ओर बहती हैं फैशन की रंगीन हवाएँ।
प्रेमालाप किये देता है,मुखरित मौन दिशाएँ।
अरे आज सौन्दर्य निरा उपहास बना जाता।
उच्छृंखलता का भारत को रोग लगा जाता।
उन्हे सात्विक प्रेम पंथ का,सहज ग्यान वर दे।
अथवा झूठे विरह समाकुल, उर में रस भर दे।
बोलो तो कवि क्या कर दे।।
अच्छी अभिव्यक्ति।
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