गीत
रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।
कोई छलिया न पथ में तुम्हें जाय मिल,
देख उसकी अदा उर- कमल जाय खिल।
प्रेम का एक नाटक न दे वह रचा,
और तुम पात्र बनकर लुटा दो अखिल।
वह सफलता पे अपनी स्वयं हो फिदा,
और तुम गर्व से मुस्कराती चलो।
रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो ।।
तेरे सौन्दर्य की कर प्रशंसा यहां,
लूट लेने को कितने भ्रमर घूमते।
प्रेम का ढोंग, वैभव की ढपली बजा,
वासना से विनत हो चरण चूमते।
अपनी लय-ताल पर दें न तुमको नचा,
और तुम भाग्य पर गुनगुनाती चलो।
रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।।
है अमरता न यौवन की इस राह पर,
नाम भ्रमरों के जो साथ जुड़ जायगा।
जिन्दगी भर न छूटेगा यह दाग फिर,
तेरे जीवन का उपवन उजड़ जायगा।
पास होंगे न वे,साथ होगा न जग,
तब बचेगा, झिझकती लजाती चलो।
रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।।
कोई चातक न तुमको कभी चाव से,
मान घनश्याम अपलक निहारा करे।
प्यार में हो समर्पित तुम्हारे लिये,
अपना तन- मान- धन नित्य वारा करे।
तब समय याद आयेगा बीता हुआ,
पंथ होगा कि आंसू बहाती चलो।
रूपसी रूप यौवन छुपाती चलो।।
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