गीत
छोड़कर मुझको अकेला,
जा रहे किस ओर राही।
प्रेम तरु की सघन छाया-
पा, किया आवास अपना।
विश्व झंझा से बचे तुम,
सच हुआ कुछ मधुर सपना।
किन्तु तुमने क्या किया यह
बन चले चित चोर राही।
नत नयन हँसते हुए ही,
चित्त में गहरे समाये।
मधुर सी मुस्कान का रस,
विहँस कर नित साथ लाये।
जब चले आहत किया क्यों?
उर नयन की कोर राही।।
कट रही जीवन निशा अब,
आ रही अवसान, वेला।
स्नेह तरु पल्लव झड़े सब,
रह गया पतझड़ अकेला।
अब तुम्हारे स्वर्ण दिन का,
हो रहा है भोर राही।।
पल्लवों ने जो किया कुछ,
और सुमनों ने सजाया।
कंटकों ने विषधरों से,
विश्व के तुमको बचाया।।
तव पलायन पर घृणा से,
जग करेगा शोर राही।।
सुन्दर गीत।
ReplyDeleteनत नयन हँसते हुए ही,
चित्त में गहरे समाये।
मधुर सी मुस्कान का रस,
विहँस कर नित साथ लाये।
जब चले आहत किया क्यों?
उर नयन की कोर राही।।
kavita padh ke nirala kee yaad ho aayi
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