कामना
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स्वर्णिम दीप जले।
प्रगति पंथ पर झलके आभा, नूतन प्राण पले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
हठ -छल -दम्भ -द्वेष की माया, जग से दूर भगे।
नवल - ह्र्दय -उत्साह -अनालस, में मन प्राण पगे।
सत्य -प्रेम -करुणा का सुर तरु,उर-उर बीच फले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
पर ईर्ष्या पर द्रोह दमित हो,जीवन लक्ष्य मिले।
उपजे,शुचि सद्भाव परस्पर, ह्र्दय सरोज खिले।
मानव -मानव का मन तन जब, जीवन साथ चले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
देश -जाति- बन्धन तज मानव, जग की ओर बढ़े।
विश्व -शान्ति मानवता -हित नित,नव सोपान चढ़े।
युद्ध -क्लान्ति दिग्भ्रान्ति, दनुजता, का अभिशाप ढले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
दु:ख, दैन्य, लघुता का क्रन्दन, श्रुति -पथ में न अड़े।
जन-जीवन पर समता ममता, का मधुमेह झड़े।
निरुज, निरभिमद मनु - संतति हो,जड़ अवसाद टले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
दया का स्वर्णिम दीप जले।।
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स्वर्णिम दीप जले।
प्रगति पंथ पर झलके आभा, नूतन प्राण पले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
हठ -छल -दम्भ -द्वेष की माया, जग से दूर भगे।
नवल - ह्र्दय -उत्साह -अनालस, में मन प्राण पगे।
सत्य -प्रेम -करुणा का सुर तरु,उर-उर बीच फले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
पर ईर्ष्या पर द्रोह दमित हो,जीवन लक्ष्य मिले।
उपजे,शुचि सद्भाव परस्पर, ह्र्दय सरोज खिले।
मानव -मानव का मन तन जब, जीवन साथ चले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
देश -जाति- बन्धन तज मानव, जग की ओर बढ़े।
विश्व -शान्ति मानवता -हित नित,नव सोपान चढ़े।
युद्ध -क्लान्ति दिग्भ्रान्ति, दनुजता, का अभिशाप ढले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
दु:ख, दैन्य, लघुता का क्रन्दन, श्रुति -पथ में न अड़े।
जन-जीवन पर समता ममता, का मधुमेह झड़े।
निरुज, निरभिमद मनु - संतति हो,जड़ अवसाद टले।।
स्वर्णिम दीप जले।।
दया का स्वर्णिम दीप जले।।
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सुन्दर कवि कामना!
ReplyDeleteलाजबाब प्रस्तुति । नि:शब्द हूँ। कोटि कोटि बंदन।
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