गीत
जीवन का ॠतुराज मिटे कब,
कब जाने पतझर आ जाये।
मलय समीरण के सहचर बन,
निज सुगंध से जग महकाया।
रूप सुधा से खिंच-खिंच आये,
कितने भ्रमरों को भरमाया।
पता नहीं कब किस भौंरे की,
आह प्रभंजन बन लहराये।
कब जाने पतझर आ जाये।।
जग से अनुनय विनय बहुत की,
जीवन का मधुमास लुटाया।
जिस माली ने जीवन देकर,
देवों के सिर पर बिठलाया।
कौन कहे,अपमान उसी का,
जीवन से ज्वाला बन जाये।
कब जाने पतझर आ जाये।।
झुलस-झुलस कर कांति हीन हो,
निज अस्तित्व बचा न सकोगे।
भरमाये भ्रमरों के कर से,
प्रेम सुधा-रस पा न सकोगे।
रूप गन्ध का गर्व, पता क्या,
कीट मूल का ही बन जाये।
कब जाने पतझर आ जाये।।
सुन्दर गीत!
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