गीत
आज हम हैं तुम नहीं हो।
यह मलय चंचल समीरण,
डालियों से खेलता सा,
झूमता है कुंज दल में,
सहज सौख्य उड़ेलता सा,
सब सुमन तो हँस रहे हैं, पर अकेले तुम नहीं हो।
आज हम हैं तुम नहीं हो।
मधुप अवली पान कर,
मकरंद को इठला रही है,
झूंक से तरु वल्लरी भी,
झूमती हैं गा रही हैं,
चांदनी है, चंद्र भी है, पर अकेले तुम नहीं हो।
आज हम हैं तुम नहीं हो।
कोकिलों की तान मोहक,
उपवनों में छा रही है,
कुछ घुमड़ घिर घन घटा भी,
शून्य पथ पर आ रही है,
विज्जु है, हँसती हुई भी, पर अकेले तुम नहीं हो।
आज हम हैं तुम नहीं हो।
आ गया ॠतुराज सुंदर,
नव सुखद संसार लेकर,
हम एवं विरही पपीहा,
रो रहे हा आश खोकर,
पूर्व जग है, हँस रहा भी, पर अकेले तुम नहीं हो।
आज हम हैं तुम नहीं हो।
सुन्दर गीत। यह गीत पढकर स्व.रमानाथ अवस्थी जी का गीत की पंक्तियां याद आ गयीं:
ReplyDeleteआज आप हैं हम हैं लेकिन,
कल कहां होंगे, कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।