गीत
पंछी केवल नीड़ न झांको,
बाहर सोने का संसार।
कुछ तिनकों को बीन-बीन कर,
तुमने अपना नीड़ बनाया।
स्वर्ण क्षणों का संगम देकर,
उन तिनकों में स्नेह सजाया।
वे हैं जिस संसृति के तिनके,
वह संसृति है रूप अगार।
पंछी केवल नीड़ न......।।
ममता पली नीड़ में रहकर,
स्वप्न सुनहरे कितने आये।
जिनमें जीवन भी मुसकाया,
पर अभिमत फल हाथ न आये।
कोई अभिमत फल दाता भी,
इस जग के उस पार।
पंछी केवल नीड़ न....।।
ये तरु-लता देखकर तुझको,
एक क्षितिज रेखा भर देते।
क्षितिज अंक ले विश्व तुम्हारा,
उसमें प्राणों के स्वर देते।
संसृति के प्राणों का सरगम,
व्याप्त जहां वह शून्य अपार।
पंछी केवल नीड़ न झांको,
बाहर सोने का संसार।
पंछी केवल नीड़ न झांको,
ReplyDeleteबाहर सोने का संसार।
सुन्दर गीत। सुन्दर भाव!