गीत
विश्व के एक कोने में जाकर कहीं,
साध लेते किसी की अमर साधना।
सिन्धु सौन्दर्य की थाह होती नहीं,
हर हृदय में अमिट चाह होती नहीं।
स्नेह का दीप उर-उर में जलता नहीं,
उर सभी के लिए तो मचलता नहीं।
प्राण पण से समर्पित कहीं हो कोई-
साध लेते उसी की अमर साधना।
वासना पंक में जो सनी ही न हो,
सारे जग के लिए जो बनी ही न हो,
चातकी बन सदा जो निहारा करे,
एक घनश्याम को, बस पुकारा करे।
भूल पाते न उसकी अलौकिक छटा,
साध लेते उसी की अमर साधना।
हो विनत अश्रुजल जो बहाती मिले,
याचना भाव मुख पर रमाती मिले।
हर हृदय बन्ध खोले, सिसकती मिले,
निज विगत सोंचकर, हाथ मलती मिले।
उसके मन की व्यथा को हृदय में लिए-
साध लेते उसी की अमर साधना।
सुन्दर गीत। खासकर ये पंक्तियां:
ReplyDeleteसिन्धु सौन्दर्य की थाह होती नहीं,
हर हृदय में अमिट चाह होती नहीं |
स्नेह का दीप उर-उर में जलता नहीं,
उर सभी के लिए तो मचलता नहीं |