गीत
जीवन अधर में अपने आधार ढूंढता हूँ,जीवन तरी का फिर से पतवार ढूंढता हूँ|
जीता रहा अकेला भव सिन्धु था गरजता,
अबतक वही दशा है, मंझधार ढूंढता हूँ|
कितने दिवस बिताये, मुरझा रहा सुमन ही,अब कुछ दिनों से विकसा, वह प्यार ढूंढता हूँ|
किंचित झलक मिली थी, पर उर न डोल पाया,
एक बार देखने को, मनुहार ढूंढता हूँ|
जग तू न दे सका था, मेरे ह्रदय का संबल,
मैं जीतता रहा हूँ, अब हार ढूंढता हूँ|
मैं मान लूँ कि हारा, शत बार तुमसे हारा,
पर तुम कठोर उर हो, मैं प्यार ढूंढता हूँ|
जीवन अधर में अपने आधार ढूंढता हूँ,जीवन तरी का फिर से पतवार ढूंढता हूँ|
सुन्दर गीत! यह गीत कविजी की आवाज में (ऑडियो/वीडियो) लगाइये।
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