गीत
स्मृतियों का भार लिए मैं, जग से हार चला।
मधुरितु में, मधुमय चुम्बन में,
मधुस्मित में, आलिंगन में,
जाने क्या था, मधुचितवन में,
क्या था, उस मधुमय सिहरन में।
छल-प्रपंच के निविड़ क्रोड में, निर्मम प्यार पला।जग से हार चला॥
ममतामयी, करुण गाथाएं,
सुन-सुन रीझा मर्मव्यथायें,
दृग भीगे, आंसू के जल से,
भाव थके, लख, विगत विकल से।
कलुष भूल, डूबा आंसू जल, उर मनुहार छला।जग से हार चला॥
अब अतीत लगता सपना सा,
जग का हुआ रहा अपना सा,
वैभव के आकुल नर्तन में,
भाव भूमि के परिवर्तन मे।
मृगतृष्णा दायित्व बन गयी, संशय भार टला।
जग से हार चला॥
मधुरितु में, मधुमय चुम्बन में,
ReplyDeleteमधुस्मित में, आलिंगन में,
जाने क्या था, मधुचितवन में,
क्या था, उस मधुमय सिहरन में।
बहुत खूब। ये गीत कविजी की आवाज में भी लगायें।