गीत
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।
देखना कनखियों का सताता रहा,
ले सिसकियां हँसी, याद आता रहा,
स्वप्न कितने जगे स्वप्न कितने बुझे,
फिर भी सपने संजोते रहे रात भर।
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।।
नत नयन हो हँसी, दन्त मुक्तावली,
खिल गयी ज्यों चटक करके दाडिम कली,
उर हमारा तडप करके कुछ कह गया,
किसने जाना कि गाते रहे रात भर।
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।।
दूर थे हांथ कैसे पहुँचते वहां,
जिंदगी का चमन लुट रहा था जहां,
देखते-देखते सब हमारा लुटा,
हाथ मलते कलपते रहे रात भर।
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।।
कल्पना सूख कर आज मुरझा गयी,
वह पुरानी हुयी, जो थी हलचल नयी,
चाँद भी घिर गया राहु की चाल से,
नैन खोले निरखते रहे रात भर।
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।।
आज अँगणाइयां कल की अठखेलियां,
चौकड़ी भर गयी सारी रंगरेलियां,
काल के एक झोंके से सब ढह गया,
याद कर हाय सोते रहे रात भर।
वह भी दिन थे कि रोते रहे रात भर।।
बहुत सुन्दर गीत।
ReplyDeleteनत नयन हो हँसी, दन्त मुक्तावली,
खिल गयी ज्यों चटक करके दाडिम कली,
उर हमारा तडप करके कुछ कह गया,
कविजी के आडियो-वीडियो बनाकार लगायें ।
I have read all the songs. But I like most this heart toching song-"vah bhi din the ki rote rahe raat bar.................."
ReplyDelete(K.K.Mishra-lecturer in English S.V.N.I.C.GOLA)
I have read all the songs. But I like most this heart toching song-"vah bhi din the ki rote rahe raat bar.................."
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