गीत
हो सकता है, चमके बिजली,फिर बादल घिर आये|
मत्त मयूरी नाचे मधुवन,
मादकता छा जाए तन-मन,
भूले विसरे स्वप्न सुनहले,लख,जीवन लहराए|फिर बादल घिर आये||
तृषित चातकी पी-पी बोले,
स्वांति बूंद हित,निज मुख खोले,
तृप्ति आश में, अपलक निरखे,निज अस्तित्व गवांये|फिर बादल घिर आये||
हो सकता है उपल वृष्टि से
स्वांति हीन हो,कुपित द्रष्टि से,
विनय foMfEcr विगत सोंचकर, निज प्रतिशोध चुकाये|
जितने बादल उतने रंग हैं,
उतने ही जीवन के ढंग हैं,
स्वांति cawne; सभी मेघ हैं, जो समझे पछताए|
री चातकी ! अगम यह जग है,
उससे अगम तुम्हारा मग है,
विनय स्नेह के तृषित , रिक्तघन - फिरते स्वांग रचाए|फिर बादल घिर आये||
अच्छा गीत !
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